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Monday, October 23, 2023

बुराई पर अच्छाई की जीत और असत्य पर सत्य की जीत का उत्सव विजय दशमी: दशहरा


 संवाददाता - रोहिणी राजपूत 














बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक माना जाने वाला विजयदशमी का त्योहार हर साल बड़ी ही धूम-धाम से मनाया जाता है। वहीं इसके अलावा यह भी माना जाता है कि विजयादशमी के दिन मां दुर्गा ने 9 दिनों के युद्ध के बाद महिषासुर का वध किया और इस तरह अच्छाई की जीत हुई।
आइए विस्तार से जानते हैं दशहरा मानने के मुख्य कारण













1.  माता ने किया था महिषासुर का वध : इस दिन माता कात्यायनी दुर्गा ने देवताओं के अनुरोध पर महिषासुर का वध किया था तब इसी दिन विजय उत्सव मनाया गया था। इसी के कारण इसे विजयादशमी कहा जाने लगा। विजया माता का एक नाम है। यह पर्व प्रभु श्रीराम के काल में भी मनाया जाता था और श्रीकृष्‍ण के काल में भी। माता द्वारा महिषासुर का वध करने के बाद से ही असत्‍य पर सत्‍य की जीत का पर्व विजयादशमी के रूप में मनाया जानें लगा।














2. श्रीराम ने किया था रावण वध : वाल्मीकि रामायण के अनुसार भगवान राम ने ऋष्यमूक पर्वत पर आश्‍विन प्रतिपदा से नवमी तक आदिशक्ति की उपासना की थी। इसके बाद भगवान श्रीराम इसी दिन किष्किंधा से लंका के लिए रवाना हुए थे। यह भी कहा जाता है कि रावण वध के कारण दशहरा मनाया जाता है। दशमी को श्रीराम ने रावण का वध किया था। श्रीराम ने रावण का वध करने के पूर्व नीलकंठ को देखा था। नीलकंठ को शिवजी का रूप माना जाता है। अत: दशहरे के दिन इसे देखना बहुत ही शुभ होता है। रावण का वध करने के बाद से ही यह पर्व बुराई पर अच्‍छाई की जीत की खुशी में मनाया जानें लगा।


विजयादशमी कृतज्ञता का दिन है। इस दिन हमने जीवन में जो भी कुछ प्राप्त किया है, उसके लिए हम कृतज्ञ होते हैं।
 हिंदू परंपरा में नवरात्रि के दौरान और दशहरा से एक दिन पहले शस्त्रों की पूजा की मान्यता है। अभी भी काफ़ी लोग इसे से परिचित नहीं हैं। 


ज्योतिषाचार्य ने बताया कि दशहरा के दिन शस्त्र पूजन करने की परंपरा सदियों पुरानी है। आश्विन शुक्ल पक्ष दशमी को शस्त्र का पूजन किया जाता है। नवरात्रि के नौ दिनों तक मां दुर्गा के पूजन के बाद दशहरे का त्योहार मनाया जाता है। विजयदशमी पर मां दुर्गा का पूजन किया जाता है। मां दुर्गा शक्ति का प्रतीक हैं। भारत की रियासतों में शस्त्र पूजन धूम-धाम से मनाया जाता था। अब रियासतें तो नही रहीं लेकिन परंपराएं शाश्वत हैं, यही कारण है कि इस दिन आत्मरक्षार्थ रखे जाने वाले शस्त्रों की भी पूजा की जाती है। हथियारों की साफ-सफाई की जाती है और उनका पूजन होता है. ऐसी मान्यता है कि इस दिन किए जाने वाले कामों का शुभ फल अवश्य प्राप्त होता है। यह भी कहा जाता है कि शत्रुओं पर विजय प्राप्त करने के लिए इस दिन शस्त्र पूजा करनी चाहिए।
शस्त्र पूजन को दुसरा नाम "आयुध पूजा" भी हैं।














शस्त्र पूजा क्या है ?
यह वह दिन है जिसमें हम शस्त्रों को पूजते हैं और उनके प्रति कृतज्ञ होते हैं. क्योंकि इनका हमारे जीवन में बहुत महत्व है। इस दिन क्षत्रिय अपने शस्त्रों की, शिल्पकार अपने उपकरणों की पूजा करते हैं, कला से जुड़े लोग अपने यंत्रों की पूजा करते हैं. दक्षिण भारत में इस दिन सरस्वती पूजा होती है।


शस्त्र पूजा का महत्व:
शस्त्र पूजा का संबंध मां दुर्गा से हैं। इसे नवरात्रि में मनाया जाता है। मान्यता है कि दशहरा से पहले आयुध पूजा में शस्त्र, यंत्र और उपकरणों का पूजन करने से हर कार्य में सफलता मिलता है

 प्राचीन काल में क्षत्रिय युद्ध पर जाने के लिए दशहरा का दिन चुनते थे, ताकि विजय का वरदान मिले। इसके अलावा पौराणिक काल में ब्राह्मण भी दशहरा के ही दिन विद्या ग्रहण करने के लिए अपने घर से निकलते थे और व्यापारी वर्ग भी दशहरा के दिन ही अपने व्यापार की शुरुआत करना अच्छा मानते थे। यही वजह है कि दशहरे से पहले आयुध पूजा बहुत महत्वपूर्ण मानी जाती है.
















आयुध पूजा का पर्व कैसे मनाते हैं 
इस दिन सभी यंत्रों की अच्छी तरह से सफाई कर उनकी पूजा की जाती है। कुछ भक्त देवी का आशीर्वाद लेने के लिए अपनी जीत की उपलब्धियों को यानि अपने उपकरण देवी के सामने रखते हैं। शस्त्र पूजा के दिन छोटी-छोटी चीज़ें जैसे पिन, चाकू, कैंची, वाद्य यंत्र, हथकल से लेकर बड़ी मशीनें, गाड़ियां, बस आदि सभी को पूजा जाता है।


शस्त्र पूजा का इतिहास: 
महिषासुर को परास्त करने के लिए समस्त देवताओं ने देवी दुर्गा को अपने-अपने शस्त्र प्रदान किए थे। महिषासुर जैसे शक्तिशाली राक्षस को को हराने के लिए देवों को अपनी समूची शक्तियां एक साथ लानी पड़ी। अपनी दस भुजाओं के साथ मां दुर्गा प्रकट हुईं, उनकी हर भुजा में एक हथियार था। महिषासुर और देवी के बीच नौ दिन तक लगातार युद्ध चलता रहा। दसवें दिन मां दुर्गा ने महिषासुर का वध कर दिया। सभी शस्‍त्रों के प्रयोग का उद्देश्‍य पूरा हो जाने के बाद उनका सम्‍मान करने का समय था, उन्‍हें देवताओं को वापस लौटना भी था। इसलिए सभी हथियारों की साफ-सफाई के बाद पूजा की गई, फिर उन्‍हें लौटाया गया।इसी की याद में शस्त्र पूजा (आयुध पूजा)की जाती है।















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