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Wednesday, November 1, 2023

मां की महिमा: देवभूमि की मां झूला देवी, जहां शेर करता हैं रखवाली

 संवाददाता - रोहिणी राजपूत












उत्तराखंड अपने आप में कई रहस्यों को समेटे हुए है। इसलिए इस धरती को देवताओं की भूमि, "देवभूमि" भी कहा जाता है। आज हम आपकों देवभूमि के बारे में एक ऐसे मंदिर से अवगत कराते हैं, जिसके बारे में कहा जाता है कि यहां मंदिर की रखवाली मां की सवारी, शेर करता है। सुनने में आश्चर्यजनक हैं परंतु यह सत्य घटना पर आधारित हैं।



अल्मोड़ा जिले के रानीखेत में झूला देवी मंदिर स्थित है। यह कहा जाता है कि मंदिर लगभग 700 वर्ष पुराना है । चैबटिया क्षेत्र जंगली जानवर से भरा घना जंगल था । “तेंदुओं और बाघ” आसपास के लोगों पर हमला करते थे और उनके पालतू पशुओं को ले जाते थे । लोगों को “तेंदुओं और बाघ” से डर लगा रहता था और खतरनाक जंगली जानवर से सुरक्षा के लिए आसपास के लोग ‘माता दुर्गा’ से प्रार्थना करते थे । ऐसा कहा जाता है कि ‘देवी’ ने एक दिन चरवाहा को सपने में दर्शन दिए और चरवाहा से कहा कि वह एक विशेष स्थान खोदे, क्यूंकि देवी उस स्थान पर अपने लिए एक मंदिर बनवाना चाहती थी। जैसे ही चरवाहा ने गड्ढा खोदा तो चरवाहा को उस गड्ढे में देवी की मूर्ति मिली। इसके बाद ग्रामीणों ने उस जगह पर एक मंदिर का निर्माण किया और देवी की मूर्ति को स्थापित किया और इस तरह ग्रामीणों को जंगल जानवरों द्वारा उत्पीड़न से मुक्त कर दिया गया। मंदिर की स्थापना के कारण चरवाहा अपने पशुओ को घास चरहने के लिए निश्चित होकर वहां छोड़ जाते थे। मंदिर परिसर के चारों ओर लटकी हुई अनगिनत घंटियां ‘मां झुला देवी’ की दिव्य व दुःख खत्म करने वाली शक्तियों को दर्शाती है । मंदिर में विराजित झूला देवी के बारे में यह माना जाता है कि झूला देवी अपने भक्तों की इच्छाओं को पूरा करती हैं और इच्छाओं को पूरा करने के बाद भक्त यहाँ तांबे की घंटी भेट स्वरुप चढाने आते हैं।














झूला देवी मंदिर को "माँ झुला देवी मंदिर" और "घंटियों वाला मंदिर" के रूप में भी जाना जाता है रानीखेत का प्रमुख आकर्षण है यह ‘घंटियों वाला मंदिर’। मां दुर्गा के इस छोटे-से शांत मंदिर में श्रद्घालु मन्नत पूरी होने पर छोटी-बड़ी घंटियां चढ़ाते हैं। यहां बंधी हजारों घंटियां देख कर कोई भी अभिभूत हो सकता है।
रानीखेत में स्थित मां दुर्गा के इस मंदिर की रखवाली बाघ करते हैं, लेकिन वह स्थानीय लोगों को कोई नुकसान नहीं पहुंचाते हैं। नवरात्र पर मां के इस मंदिर में भक्तों का सिलसिला लग जाता है।


















 मंदिर की स्थापना के बाद पिलखोली गांव के लोग अक्सर अपने जानवरों को चराने के लिए इस स्थान पर आते थे. बताया जाता है कि सावन के महीने में सभी बच्चे मां के प्रांगण में झूला डालकर झूला झूलते थे। मां के झूला झूलने के बारे में एक और कथा प्रचलित है। माना जाता है कि एक बार श्रावण मास में माता ने किसी व्यक्ति को स्वप्न में दर्शन देकर झूला झूलने की इच्छा जताई। ग्रामीणों ने मां के लिए एक झूला तैयार कर उसमें प्रतिमा स्थापित कर दी।तब से लेकर आज तक, देवी मां झूले पर विराजमान हैं और तब से ही मां को झूला देवी के नाम से जाना जाता है। उसी दिन से यहां देवी मां “झूला देवी” के नाम से पूजी जाने लगी।




























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