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Saturday, February 3, 2024

1971 में पाक को खदेड़ बांग्लादेश बनाने वाले, निडर साहसी सैम बहादुर की कहानी

 संवाददाता - रोहिणी राजपूत


















Field Marshal Sam Manekshaw भारतीय सेना के पहले फील्ड मार्शल जनरल सैम मानेकशॉ का जन्म 3 अप्रैल 1914 को हुआ था। आइए जानते है एक ऐसे व्यक्ति की कहानी जिसने इंडियन आर्मी के इतिहास में अपना नाम दर्ज़ किया और इसे मिटा पाना नामुमकिन है। एक ऐसे शख्स जो निडर, साहसी और अत्याधिक बहादुर किस्म के थे, जिन्हें ना तो अपने पद की चिंता थी, ना ही पदवी की, चिंता थी तो बस हिंदुस्तान की। यह वह नाम है जो ना तो दुश्मनों की गोलियों से डरा और ना ही इन्दिरा गांधी जैसी एकाधिकारी रखने वाली लीडर से।

यह कहानी हैं भारत माता के वीर सपूत सैम बहादुर की, जिनके सीने से निकली हर सांस जय हिंद का सुर लगाती थी। 
सैम का जन्म ही एक आर्मी मैन बनने के लिए हुआ था। एक ऐसा आर्मी मैन जो निडर, निर्भीक और मौत की आंखों में आंखे डालकर दुश्मन से लोहा लेने का जज़्बा रखता था।
उनकी प्रारंभिक शिक्षा अमृतसर और शेरवुड कॉलेज नैनीताल में हुई थी। मानेकशॉ भारतीय सैन्य अकादमी के लिए चुने जाने वाले 40 कैडेटों के पहले बैच के थे और उन्हें 4 फरवरी 1934 को 12 एफएफ राइफल्स में कमीशन किया गया था। 


बर्मा के खिलाफ लिया था युद्ध में भाग

इसका परिचय सैम बहादुर ने Second World War में 1942 में दिया। उस दौरान युद्ध के हालात और shortage of staff को देखते हुए मानेकशॉ को प्रमोशन दिया, इस जिम्मेदारी के साथ ब्रिटिश इंडिया आर्मी के यंग कैप्टन के रूप में बर्मा में नियुक्त किया गया। इसी दौरान वह बर्मा में Sittang River के किनारे  जापानी आर्मी से लोहा ले रहे थे। जहां दोनों दलो के बीच काफी भीषण युद्ध छिड़ा हुआ था।



द्वितीय विश्व युद्ध में लगी थीं 9 गोलियां

 जापानी सैनिक द्वारा मशीन गन से फायर की गई 9 गोलियां सैम मानिकशॉ के lungs, stomach, liver, intestine और kidneys को छेद करते हुए आर–पार हो गई, मगर ऐसी हालत के बावजूद भी सैम 36 घंटो तक युद्ध के मैदान पर Unconscious State में पड़े रहें।
उसके बाद उनके सिख बटालियन के भारतीय सिपाही शेर सिंह ने उन्हें अपने कंधे पर टांग कर पास के मेडिकल कैंप में ले गए, सैम की हालत देखकर डॉक्टर ने अपने हाथ खड़े कर दिए और इसे फिनिश केस घोषित कर दिया।
लेकिन सिपाही शेर सिंह डॉक्टर से सैम बहादुर को ठीक करने की मिन्नते मांगते रहे। इसी दौरान अचानक सैम को होश आ गया। कैंप में मौजूद सर्जन ने आश्चर्यजनक होकर शेर सिंह से पूछा– आखिर इसे हुआ क्या? सैम ने बहुत ही मजाकिया अंदाज में जवाब दिया और मुस्कुराते हुए बोले "डॉक्टर मुझे गधे ने लात मार दी है।"


बता दे की, 1947 में भारत-पाकिस्तान बंटवारे के दौरान पारसी समाज के सैम बहादुर के पास यह मौका था कि, वह चाहते तो पाकिस्तान आर्मी जॉइन कर सकते थे लेकिन उन्होंने इंडियन आर्मी को ही चुना।
इसके बाद उन्हें गोरखा राइफल्स में तैनात कर दिया गया, जहां सोल्जर में सैम मानेकशॉ के नाम को एक नाम दिया था "सैम बहादुर"। सैम बहादुर ने कई जंग में अपनी अहम भूमिका निभाई चाहे वह समय जब पाकिस्तान ने ट्राइबल रिबेलियंस की आड़ में कश्मीर घाटी पर हमला कर दिया हो या 1962 में INDO–SINO का युद्ध हों, जहां भारत की सेना बैकफुट पर थी। इसी बीच तेजी से बदलती घटनाक्रम के चलते कमांडिंग के 4 कॉप्स जनरल ऑफिसर लेफ्टिनेंट जनरल ब्रिज मोहन कॉल को हटाकर नॉर्थ ईस्ट का मोर्चा संभालने खुद जनरल सैम मानेकशॉ को भेजा गया।




























इंदिरा गांधी का विरोध करने में सबसे आगे

जब साल 1971 में तत्कालीन भारतीय प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने सैम मानेकशॉ से लड़ाई के लिए तैयार रहने पर सवाल किया था। इस बात के जवाब में सैम मानेकशॉ ने कहा था, ‘आई एम ऑलवेज रेडी, स्वीटी।
1971 की लड़ाई में इंदिरा गांधी चाहती थीं कि वह मार्च में ही पाकिस्तान पर चढ़ाई कर दें, लेकिन सैम ने ऐसा करने से इनकार कर दिया, क्योंकि भारतीय सेना हमले के लिए तैयार नहीं थी।
इंदिरा गांधी इससे नाराज हुईं थी। मानेकशॉ ने पूछा कि अगर आप युद्ध जीतना चाहती हैं तो मुझे छह महीने का समय दीजिए। मैं गारंटी देता हूं कि जीत हमारी ही होगी।
3 दिसंबर को फाइनली वॉर शुरू हुआ। सैम ने पाकिस्तानी सेना को सरेंडर करने को कहा, लेकिन पाकिस्तान नहीं माना। 14 दिसंबर, 1971 को भारतीय सेना ने ढाका में पाकिस्तान के गवर्नर के घर पर हमला कर दिया।
इसके बाद 16 दिसंबर को ईस्ट पाकिस्तान आजाद होकर ‘बांग्लादेश’ बन गया। इसी जंग में पाकिस्तान के 93 हजार सैनिकों ने आत्मसमर्पण भी किया।


1972 में मानिकशॉ को पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया और 1973 में उन्हें फील्ड मार्शल से नियुक्त किया गया।
27 जून, 2008 को सैम बहादुर (94) वर्ष की आयु में निमोनिया से लड़ते हुए परमात्मा में विलीन हो गए। भारतीय इतिहास में सैम मानिकशॉ उर्फ सैम बहादुर के जज्बे को कोई तोड़ नहीं सकता क्योंकि उनके आखिरी शब्द– "आई एम ओके" थे।

















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